कल है विश्व पुस्तक दिवस, Puffin India पेश करेगी दस अनमोल लोककथाओं का खजाना

नई दिल्‍ली। कल विश्व पुस्तक दिवस है और इस अवसर पर Puffin India भारत के बेहतरीन लेखकों की कलम से लिखी दस अनमोल लोककथा ओं को एक किताब में पेश करेगी।

‘ द पफिन बुक ऑफ फोकटेल्स ’’ रस्किन बॉंड , सुधा मूर्ति , कमला दास , देवदत्त पटनायक सरीखे देश के बेहतरीन कथाकारों की दिलफरेब लोककथाओं का एक नायाब गुलदस्ता है।

पफिन ( पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ) की एसोसिएट पब्लिशर सोहनी मित्रा के अनुसार इसका मकसद किताबें पढ़ने के लुत्फ को परवान चढ़ाना और उसे फैलाना है। साथ ही सभी तक किताबों और कहानियों की पहुंच बनाने की एक कोशिश है।

खास तौर पर विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर पुस्तक के इस संस्करण को ऑनलाइन स्टोर पर जारी करने के लिए पफिन ने फ्लिपकार्ट और यूनेस्को के साथ साझेदारी की है।

मित्रा ने कहा , ‘‘ विश्व पुस्तक दिवस पर कहानियों , किताबों और पढ़ने की चाहत का जश्न मनाया जाता है इसके स्वभाव के मद्देनजर हमें अपने पाठकों के लिए भारत के अग्रणी लेखकों की लोककथाओं का एक नायाब संग्रह पेश करते हुए खुशी हो रही है। ’’

Puffin India के इस संग्रह में मंजुला पद्मनाभन , मुशर्रफ अली फारूकी , शशि देशपांडे , एके रामानुजन और मीरा उबरोइ ने अपना योगदान दिया है।
विश्व पुस्तक दिवस विशेष: विश्व में भारतीय किताब पढ़ने में सबसे आगे

23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस है। ‘वर्ल्ड कल्चर स्कोर इंडेक्स’ पर विश्व में भारतीय किताब पढ़ने में सबसे आगे हैं। साइबर जमाने में भी किताबों के जरिए पढ़ने के सुख को प्राप्त करना हमारी एक सांस्कृतिक जीत है।

अमेरिका के प्रसिद्ध निबंधकार और दार्शनिक ‘राल्फ वाल्डो इमर्सन’ ने कहा था, ‘अगर हमारा किसी असाधारण बुद्धिमत्ता वाले व्यक्ति से सामना होता है, तब हमें पूछना चाहिए कि उसने कौन-सी किताब पढ़ी है?’ किसने कितनी किताबें पढ़ी हैं, यह पूछना भले ही थोड़ा कठिन हो, लेकिन आज गूगल और विकिपीडिया के जमाने में किताबें कहां है? यह सवाल जरूर खड़ा हो सकता है।

23 अप्रैल को हम हर बार की तरह इस बार भी ‘विश्व पुस्तक दिवस’ मनाएंगे। लेकिन क्या किताबों का हमारे जीवन में आज भी वही महत्व है, जो हजारों वर्षों से रहा है या सोशल मीडिया ने उसमें दखल दिया है? यह कुछ ऐसे सवाल हैं, जो बार-बार पूछे जाते हैं। भले ही पिछले कुछ वर्षों में युवाओं के बीच सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों का उपयोग तेजी से बढ़ने के कारण उनकी किताब पढ़ने की आदतों में कमी आई है, इसके बावजूद आज भी युवा डिजिटल माध्यमों से ज्यादा किताबों को ही तवज्जो देते हैं। आंकड़ों की मानें, तो एक औसत भारतीय आज भी अपने समकक्ष देशों के मुकाबले ज्यादा किताब पढ़ता है। हालांकि, यह आंकड़ा धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

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